जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में आतंकियों ने छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी हिंदू मजदूरों की पहचान पूछकर गोली मार दी। दोनों की मौत हो गई। सुरक्षा एजेंसियां CCTV फुटेज और अन्य सुरागों के आधार पर जांच में जुटी हैं।


जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में एक बार फिर आतंकियों ने प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाया है। शुक्रवार देर रात ईंट-भट्ठे पर काम कर रहे छत्तीसगढ़ के दो हिंदू मजदूरों पर पहले उनकी पहचान पूछने के बाद गोलियां चला दी गईं। इस हमले में दोनों की मौत हो गई। वारदात के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। पुलिस, सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां हमलावरों की तलाश में लगातार सर्च ऑपरेशन चला रही हैं। शुरुआती जांच में प्रतिबंधित आतंकी संगठन टीआरएफ (TRF) से जुड़े आतंकियों की भूमिका की आशंका जताई गई है।
यह घटना दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के केलाम इलाके में हुई, जो जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर है। अधिकारियों के अनुसार, दोनों मजदूर रोज की तरह ईंट-भट्ठे पर काम कर रहे थे। इसी दौरान आतंकी वहां पहुंचे, उन्होंने पहले दोनों की पहचान पूछी और फिर उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। आसपास मौजूद लोगों ने रात में करीब 10 से 12 राउंड गोलियां चलने की आवाज सुनने की बात कही। सूचना मिलते ही पुलिस और सुरक्षा बल मौके पर पहुंच गए। पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी गई और करीब दो किलोमीटर के दायरे में तलाशी अभियान शुरू किया गया, जो अब भी जारी है।
हमले में 24 वर्षीय दीपक रात्रे की मौके पर ही मौत हो गई थी। वहीं 28 वर्षीय भूपेंद्र गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (SKIMS) पहुंचाया गया, लेकिन शनिवार सुबह इलाज के दौरान उन्होंने भी दम तोड़ दिया। दोनों मजदूर छत्तीसगढ़ के रहने वाले थे और काम की तलाश में जम्मू-कश्मीर आए थे। वे कुलगाम के एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी कर अपने परिवार का गुजारा चला रहे थे।
जांच एजेंसियों के मुताबिक हमलावर बाइक पर सवार होकर आए थे। फिलहाल इस बात की भी जांच की जा रही है कि वारदात में एक स्थानीय और एक पाकिस्तानी आतंकी शामिल था या नहीं। शुरुआती जांच का फोकस मोहम्मद लतीफ नाम के संदिग्ध पर है। एजेंसियों का कहना है कि उसका नाम पिछले वर्ष लश्कर-ए-तैयबा और उसके सहयोगी संगठन टीआरएफ (TRF) से जुड़ा था। फिलहाल पूरे मामले की कई पहलुओं से जांच की जा रही है।
ईंट-भट्ठों पर पहले हुए आतंकी हमलों के बाद पुलिस ने यहां CCTV कैमरे लगाने के निर्देश दिए थे। जिस भट्ठे पर यह हमला हुआ, वहां भी कैमरे मौजूद थे। अब जांच एजेंसियां फुटेज को खंगाल रही हैं, ताकि हमलावरों की पहचान हो सके और यह पता लगाया जा सके कि वे किस रास्ते से आए और वारदात के बाद किस दिशा में भागे। अधिकारियों के मुताबिक इस इलाके में 20 से ज्यादा ईंट-भट्ठे हैं, जहां बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर काम करते हैं।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने घटना पर दुख जताते हुए कहा कि मृतकों के परिजनों को पहले से तय 6 लाख रुपये की सहायता राशि के अलावा मुख्यमंत्री राहत कोष से 10 लाख रुपये की अतिरिक्त आर्थिक मदद भी दी जाएगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार प्रभावित परिवारों के साथ खड़ी है और हरसंभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
कश्मीर में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों पर हमले कोई नई बात नहीं हैं। बीते कुछ वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें रोजगार की तलाश में घाटी पहुंचे लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। साल 2019 में कुलगाम में पश्चिम बंगाल के पांच मजदूरों की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद 2021 में बिहार के रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं पर हमला हुआ, जबकि 2022 में बडगाम में बिहार के एक किशोर मजदूर की हत्या कर दी गई। वर्ष 2024 में गांदरबल और रियासी में हुए आतंकी हमलों ने भी कई परिवारों को गहरा सदमा दिया। लगातार हो रही ऐसी घटनाएं यह सवाल फिर खड़ा करती हैं कि घाटी में काम करने वाले प्रवासी मजदूर आखिर कितने सुरक्षित हैं।
रोजगार की उम्मीद लेकर हर साल करीब तीन से पांच लाख प्रवासी मजदूर जम्मू-कश्मीर पहुंचते हैं। इनमें सबसे ज्यादा श्रमिक बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आते हैं। कोई सड़क निर्माण में काम करता है, तो कोई ईंट-भट्ठों, कृषि, बागवानी, होटल, पर्यटन और छोटे उद्योगों में रोजगार तलाशता है। ऐसे में जब इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं, तो सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था पर ही सवाल नहीं उठते, बल्कि उन हजारों परिवारों की चिंता भी बढ़ जाती है, जिनकी रोजी-रोटी इन्हीं मजदूरों की कमाई पर टिकी होती है।
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